भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के संगठन, कार्य एवं अधिकारों का वर्णन कीजिए।

भारत की सबसे ऊँची स्तर की न्यायपालिका नई दिल्ली स्थित सर्वोच्च न्यायालय है। इस न्यायालय का गठन संविधान द्वारा निर्धारित कर दिया गया है। मूल संविधान में एक मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त 7 अन्य न्यायाधीश की व्यवस्था थी। संशोधित अधिनियम 1977 के अनुसार इसकी संख्या मुख्य न्यायाधीश सहित 18 थी। वर्तमान में 1985 में किए गए संशोधन के अनुसार एक मुख्य न्यायाधीश तथा 25 अन्य न्यायाधीश की व्यवस्था की गई है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की संख्या धारा 124 के अनुसार संसद अधिनियम पारित कर बढ़ा सकती है। सर्वोच्च न्यायालय का अधिवेशन जारी रखने के लिए गणपूर्ति का अभाव हो, तो मुख्य न्यायाधीश किसी भी उच्च न्यायालय के योग्य न्यायाधीश को आवश्यक समय के लिए तदर्थ न्यायाधीश बना सकता है। मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है। किन्तु राष्ट्रपति संवैधानिक प्रधान होते हैं।

अतः व्यवहार में वे मंत्रिपरिषद् की सलाह पर ही न्यायाधीशों की नियुक्ति करते हैं। अन्य न्यायाधीश को नियुक्ति राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय तथा राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर करते हैं, किन्तु यह आवश्यक नहीं है कि वे उनकी सलाह पर आचरण करे ही। किन्तु सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों को नियुक्त करते समय राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीशों से अनिवार्यतः परामर्श करते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय के लिए न्यायाधीशों की निम्नलिखित योग्यताएँ आवश्यक होती हैं- 

(i) उसे भारत का नागरिक होना चाहिए।

(ii) वह किसी एक या एक से अधिक उच्च न्यायालय में कम-से-कम 5 वर्षों तक न्यायाधीश रह चुका हो।

(iii) किसी एक या एक से अधिक उच्च न्यायालय में कम-से-कम दस वर्षों तक अधिवक्ता रह चुका हो।

(iv) वह राष्ट्रपति के मत में प्रसिद्ध विधिवेत्ता हो।

सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु पर अवकाश ग्रहण करता है। वह इसके पहले त्यागपत्र देकर हट सकता है। राष्ट्रपति उसे संसद के दोनों सदनों के प्रस्ताव पर हटा सकता है। संविधान द्वारा यह निश्चित कर दिया गया है कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को ऐसे वेतन दिए जाएँगें जो संसद विधि द्वारा निर्धारित करे। उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश सेवा शर्त संशोधन विधेयक 1998 के आधार पर इन न्यायाधीशों के वेतन में आवश्यक सुधार किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के लिए 33 हजार रुपये मासिक वेतन तथा अन्य न्यायाधीशों के लिए 30 हजार रुपये मासिक वेतन निर्धारित किया गया है। यह संशोधि त वेतन 01 जनवरी, 1996 से देय है। उन्हें आवास, यात्रा भत्ता आदि की विशेष सुविधा भी प्राप्त है। अवैतनिक छुट्टी तथा अवकाश प्राप्ति के बाद पेंशन का भी अधिकार न्यायाधीशों को प्राप्त है। न्यायाधीशों का वेतन, भत्ते, पेंशन आदि भारत की संचित निधि पर भारतीय व्यय है।

अधिकार एवं कार्य

सर्वोच्च न्यायलय के निम्नलिखित प्रमुख अधिकार व कार्य हैं :-

1. प्रारंभिक क्षेत्राधिकार (Original Jurisdiction) प्रारंभिक क्षेत्राधिकार दो प्रकार के होते हैं-

A. अनन्य प्रारंभिक क्षेत्राधिकार और B. समवर्ती प्रारंभिक क्षेत्राधिकार।

A. अनन्य प्रारंभिक क्षेत्राधिकार (Exclusive original jurisdiction)- इसके अन्तर्गत सर्वोच्च न्यायालय में वे मामले आते है जिनकी सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय में ही हो सकती है और सर्वोच्च न्यायालय का फैसला अंतिम होता है। ये मामले निम्न प्रकार के होते हैं-

(a) भारत सरकार और कोई राज्य अथवा एक से अधिक राज्य एक तरफ और दूसरी तरफ एक या से अधिक राज्य ।

(b) भारत सरकार और एक या अधिक राज्यों के बीच विवाद ।

(c) दो या दो से अधिक राज्यों के बीच विवाद जिसमें कोई ऐसा प्रश्न अन्तर्गत हो जिस पर किसी वैध अधिकार का अस्तित्व या विस्तार निर्भर हो ।

B. समवर्ती प्रारंभिक क्षेत्राधिकार (Concurrent original jurisdiction) – अन्तर्गत न्यायालय के अतिरिक्त उच्च न्यायालय को भी क्षेत्राधिकार प्राप्त है। उदाहरण के मूल की रक्षा का दायित्व सर्वोच्च न्यायालय के अतिरिक्त उच्च न्यायालय को भी है। लेकिन उच्च न्यायालय के फैसले के विरूद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील हो सकती है। यानी सर्वोच्च न्यायालय के मूल अधिकार के सम्बन्ध में और अपीलीय दोनों प्रकार का अधिकार है। धारा 32 के अन्तर्गत इन अधिकारों की रक्षा के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश प्रतिषेध, उत्प्रेरण तथा अधिकार पृच्छा जैसे लेख जारी किए जा सकते हैं और संसद चाहें तो उसके क्षेत्राधिकार को बढ़ा सकते हैं।

अपीलीय क्षेत्राधिकार (Appellate jurisdiction)

2. अपीलीय क्षेत्राधिकार (Appellate jurisdiction) – निम्न या अधीनस्थ न्यायालयों के फैसले की अपील सुनने का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय को है। इसके अन्तर्गत अधिकारों को चार भागों में बाँटा जा सकता है। यथा-

(i) संवैधानिक – धारा 132 में इसका वर्णन है। इसके अन्तर्गत उन मुकदमों की अपील होती है जिसने संविधान की व्यवस्था से सम्बन्धित कोई प्रश्न अन्तर्निहित हो । सर्वोच्च न्यायालय बिना प्रमाण के तब भी अपील करने की विशेष अनुमति दे सकता है यदि उसे यह निश्चित हो जाय कि किसी विवाद में विधि अथवा संविधान की व्याख्या का प्रश्न अन्तर्निहित है। संविधान की अंतिम व्याख्या का उत्तरदायित्व सर्वोच्च न्यायालय का होता है।

(ii) दीवानी – मूल संविधान के अनुसार उच्च न्यायालय को यह प्रमाण-पत्र देना पड़ता था कि दीवनी मामलों में कम-से-कम 10 हजार रूपये की लागत निहित है। किन्तु संसद् ने 30वीं संविधान संशोधन (1972) के द्वारा यह निश्चित कर दिया है कि सर्वोच्च न्यायालय में दीवानी मुकदमों की अपील की कीमत के आधार पर नहीं, मुकदमों के गुण के आधार पर की

(iii) फौजदारी – इस प्रकार की अपील दो दशाओं में की जा सकती है। सर्वप्रथम, कुछ मामलों में उच्च न्यायालयों के प्रमाण-पत्र प्राप्त किए बिना, जैसे यदि उच्च न्यायालय ने अपील में किसी व्यक्ति की उन्मुक्ति सम्बन्धी आदेश रद्द कर मृत्युदंड दिया हो अथवा दस वर्षो का कारावास दे दिया हो अथवा उच्च न्यायालय ने अपने अधीनस्थ न्यायालय से कागजात मँगाकर अभियुक्त को मृत्युदंड अथवा दस वर्षों का कारावास दिया हो । द्वितीयतः यदि उच्च न्यायालय यह प्रमाण-पत्र दे कि फौजदारी मुकदमा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विचार योग्य हो, तो अपील हो सकती है।

iv) विशेष परिस्थितिजन्य अधिकार – सर्वोच्च न्यायालय को धारा 135 (1) के अन्तर्गत भारत के किसी न्यायालय अथवा न्यायाधिकरण द्वारा किसी निर्णय या आदेश के विरूद्ध अपील के लिए इजाजत देने का अधिकार है। किन्तु सैनिक न्यायालय के निर्णय या आदेश के सम्बन्ध में यह बात लागू नहीं है। विशेष अनुमति गंभीर परिस्थितियों में ही दी जा सकती है।

परामर्शदातृ अधिकार (Advisory jurisdiction)

3. परामर्शदातृ अधिकार (Advisory jurisdiction) – धारा 147 के अन्तर्गत सर्वोच्च न्यायालय राष्ट्रपति को परामर्श दे सकते हैं। यह उस वक्त दिया जाता है जब राष्ट्रपति कानून के प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय से सलाह माँगते हैं। किन्तु सर्वोच्च न्यायालय का यह अधिकार है, क्योंकि इस प्रकार की सलाह को मानना या न मानना राष्ट्रपति की इच्छा पर निर्भर करता है।

आवृत्ति सम्बन्धी क्षेत्राधिकार (Revisional Jurisdiction)

4. आवृत्ति सम्बन्धी क्षेत्राधिकार (Revisional Jurisdiction)- सर्वोच्च न्यायालय का यह अधिकार है कि वह अपने द्वारा किए गये किसी निर्णय व आदेश का पुनः निरीक्षण या अवलोकन कर सके तथा उसकी त्रुटियों को हटाने के लिए सुधार कर सके। 1967 ई. में सर्वोच्च न्यायालय ने गोकूलनाथ के मुकदमें एवं शंकरी प्रसाद तथा सज्जन सिंह के मुकदमों में दिए गए अपने ही निर्णय को गलत घोषित कर दिया था।

अभिलेख न्यायालय (A Court of Record )

5. अभिलेख न्यायालय (A Court of Record )- सर्वोच्च न्यायालय एक अभिलेख न्यायालय है। अभिलेख न्यायालय से तात्पर्य यह है कि इस न्यायालय के अभिलेख सभी जगह साक्षी के रूप में स्वीकार किए जायेंगे और किसी भी न्यायालय में पेश किए जाने पर उनकी प्रामाणिकता के विषय में संदेह नहीं किया जा सकता। अभिलेख न्यायालय का इस दृष्टि से भी है कि अपने अपमान के लिए दण्ड देने की शक्ति रखता है। सर्वोच्च न्यायालय ने सन् 1967 ई. में नम्बूदरीपाद के विषय तथा सन् 1970 ई. केन्द्रीय मंत्री खाँडिलकर के विरूद्ध (जब उन्होंने बैंक राष्ट्रीयकरण के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की आलोचना थी।) अपने इस अि कार का प्रयोग किया था।

6. अन्य अधिकार- सर्वोच्च न्यायालय के कतिपय अन्य अधिकार भी हैं। जैसे-

(i) सर्वोच्च न्यायालय को अपने उत्तदायित्व के सिलसिले में नियम, प्रक्रिया तथा पदाधिकारियों को नियुक्त करने का अधिकार।

(ii) सर्वोच्च न्यायालय किसी व्यक्ति को अदालत में उपस्थित करने या कोई कागज पेश करने की लिए बाध्य कर सकता है।

(iii) धारा 138 के अन्तर्गत संसद् सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार को बढ़ा दे सकता है। [ See MORE भारतीय राष्ट्रपति के अधिकार अथवा शक्तियां और कार्य का वर्णन कीजिए]

संक्षेप में, यह कहा जा सकता है कि सर्वोच्च न्यायालय देश के प्रजातंत्र और संविधान का सबसे बड़ा प्रहरी है। यह प्रायः हमेशा स्वतंत्र ढंग से आचरण करता रहा है और कार्यपालिका के दबाव से मुक्त रहा है। सर्वोच्च न्यायालय को संविधान द्वारा मौलिक अधिकारों से सम्बन्धित विवादों पर सर्वोच्च न्यायालय को प्रारंभिक एवं अपीलीय क्षेत्राधिकार प्राप्त है। धारा 32 (1) सर्वोच्च न्यायालय को विशेष रूप से उत्तरदायी ठहराता है कि वह मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए समुचित कार्रवाई करें। इस उत्तरदायित्व का पालन करने के लिए उसे बंदी, प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेरण, अधिकार-पृच्छा जैसे लेख जारी करने का अधिकार है। इसके अतिरिक्त उसे न्यायिक पुनर्विलोकन को शक्ति प्राप्त हैं, जिसके द्वारा वह कार्यपालिका द्वारा पारित आदेश एवं व्यवस्थापिका द्वारा निर्मित विधियों को यदि वे संविधान के प्रावधानों के विरूद्ध हो तो घोषित कर सकता है। इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय को यह अधिकार प्राप्त हैं कि वह मूल अधिकारों को हनन करने वाले कानूनों और कार्यपालिका के कार्यों को अवैध घोषित कर दे। निःसंदेह मौलिक अधिकारों के अभिरक्षक के रूप में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका निष्पक्ष और सराहनीय रही है और यह कई अवसरों पर संविधान की रक्षा करने में सफल रहा है।

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