लोकसभा के संगठन, अधिकारों तथा कार्यों का वर्णन कीजिए।

लोकसभा भारतीय संसद् का निम्नतम तथा लोकप्रिय सदन है। संविधान के अन्तर्गत इस लोकसभा (House of the People) कहा गया है। यह जनता का प्रतिनिधि सदन है, अर्थात् इसके सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित होते हैं।

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2 लोकसभा के सदस्यों के लिए योग्यताएँ.
2.2 लोकसभा के एवं कार्य
2.2.2 निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि लोकसभा को भारतीय संविधान में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। उसके वाद-विवादों से समस्त देश में जनमत का निर्माण होता रहता है। लोकसभा के सदस्य पाँच वर्ष के बाद जनता के सामने पुनः उपस्थित होते हैं, इसलिए उनका हर एक कार्य राष्ट्रीय हित में होता है। विधि निर्माण के क्षेत्र में लोकसभा की स्थिति सर्वोपरि है। समस्त देश की वित्तीय स्थिति को लोकसभा नियंत्रित करती है कार्यपालिका को विभिन्न तरीकों से नियंत्रित करती है। इसलिए डॉ0 एम पी शर्मा ने ठीक ही कहा है कि-“अगर संसद राज्य का सर्वोच्च अंग है तो लोकसभा संसद का सर्वोच्च अंग है। व्यवहारतः यही संसद् है।”

लोकसभा का संगठन

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कसभा का संगठन- लोकसभा की सदस्य संख्या समय-समय पर बदलती रही है। 1971 में लोकसभा चुनाव के समय इसके निर्वाचित सदस्यों की संख्या 520 थी। 1971 के अन्त में 27वाँ संशोधन करते हुए इसकी सदस्य संख्या 525 की गयी और 1974 में भारतीय संविधान में 31 वाँ संशोधन किया गया। इस संवैधानिक संशोधन द्वारा अनुच्छेद 81 और अनुच्छेद 330 को संशोधित करते हुए लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 547 (545 निर्वाचित व 2 मनोनीत ) निश्चित की गयी है, 525 को भारतीय संघ के राज्यों की जनता द्वारा और 20 को केन्द्र-शासित क्षेत्रों की जनता द्वारा निर्वाचित करने की व्यवस्था है। 1974 में किए गए 34वें संवैधानिक संशोधन के अनुसार सिक्किम राज्य का भी एक प्रतिनिधि होगा। वर्तमान में इसकी सदस्य संख्या 544 (542 निर्वाचित एवं 2 मनोनीत) है। लोकसभा में बिहार के सदस्यों की संख्या 54 है।

लोकसभा के सदस्यों के लिए योग्यताएँ.

(Qualifications for the Membership of the House of the People) लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिए सदस्यों के लिए निम्नलिखित योग्यताओं का होना आवश्यक है-

(i) वह भारत का नागरिक हो 

(ii) 25 वर्ष की उम्र पूरी चुका हो 

(iii) ऐसी योग्यताएँ रखता हो जिसे संसद विधि द्वारा निर्धारित किया गया हो।

(iv) लोकसभा का सदस्य बनने के लिए अयोग्य न हो।

अयोग्यताएँ (Disqualifications)- लोकसभा की सदस्यता के लिए किसी भी प्रत्याशी में निम्नलिखित अयोग्यताएँ नहीं होनी चाहिए-

(i) वह भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अन्तर्गत किसी लाभ के पद पर न हो, किन्तु मन्त्री का पद तथा संसद द्वारा निर्धारित कोई अन्य पद जिसे मुक्त किया गया हो, इसके अन्तर्गत नहीं आता।

(ii) किसी उपयुक्त न्यायालय द्वारा पागल करार नहीं किया गया हो। (iii) दिवालिया न हो।

(iv) भारत की नागरिकता छोड़ दी हो तथा किसी विदेशी राज्य की नागरिकता ग्रहण कर ली हो।

(v) 1951 ई0 में संसद ने अग्रलिखित अयोग्यताओं का निर्धारण किया। यथा-

(a) वह निर्वाचन सम्बन्धी किसी अपराध का दोषी नहीं हो।

(b) वह किसी सरकारी नौकरी से भ्रष्टाचार के आधार पर नहीं निकला गया हो। (c) वह सरकार से सम्बन्धित किसी अनुबंध या कारखाने का हिस्सेदार न हो।यदि लोकसभा के सदस्य बनने के बाद भी किसी व्यक्ति में उपर्युक्त दोष पाये जाते हैं तो उसे लोकसभा की सदस्यता से वंचित कर दिया जाता है। अयोग्यता सम्बन्धी विवाद का निर्णय करने अधिकार निर्वाचन आयोग के अधीन है।

कार्यकाल – भारतीय लोकसभा का कार्यकाल संविधानतः 5 वर्ष है। यद्यपि 42वें संशोधन अधिनियम द्वारा इसका कार्यकाल 6 वर्ष कर दिया गया था, लेकिन पुनः 44वें संशोधन अधिनियम द्वारा इसका कार्यकाल 5 वर्ष कर दिया गया है।

सत्र एवं गणपूर्ति- संविधानतः राष्ट्रपति को समय-समय पर संसद के दोनों सदनों का अधिवेशन बुलाने का अधिकार सौंपा गया है। लेकिन इसकी अन्तिम बैठक और अगले सत्र की पहली बैठक के लिए निर्धारित तिथि के बीच 6 माह से अधिक का समय नहीं गुजरना चाहिए। इस तरह एक वर्ष के अन्दर लोकसभा की दो बैठकें होना आवश्यक है। लोकसभा की बैठक के लिए अर्थात् गणपूर्ति के लिए इसकी कुल सदस्य संख्या का 10वाँ भाग होना चाहिए। लेकिन संविधान के 42वें संशोधन द्वारा इस उपबंध को समाप्त कर दिया गया।लोकसभा के प्रत्येक सदस्य को अपना स्थान ग्रहण करने के पूर्व राष्ट्रपति या राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किसी प्राधिकारी के समक्ष अपने पद की सपथ लेनी पड़ती है।

अध्यक्ष

अध्यक्ष- लोकसभा के कार्यसंचालन के लिए अध्यक्ष पद की व्यवस्था की गयी है। अध्यक्ष के अतिरिक्त उपाध्यक्ष की भी व्यवस्था की गयी है, जो अध्यक्ष की अनुपस्थिति में संसद का कार्य संचालन करते हैं। संसद के अन्दर अध्यक्ष की स्थिति सर्वोच्च एवं महत्त्वपूर्ण होती है।

लोकसभा के एवं कार्य

लोकसभा के एवं कार्य- लोकसभा संसद का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। मंत्रिमण्डल लोकसभा के ही प्रति उत्तरदायी है। लोकसभा के निम्नलिखित प्रमुख अधिकार एवं कार्य हैं-

1. विधायी शक्ति (Legislative Powers)- संविधानतः भारतीय संसद संघीय सूची, समवर्ती सूची, अवशेष विषयों और कुछ विशेष परिस्थितियों में राज्यसूची के विषयों पर कानूनों का निर्माण कर सकती है। यद्यपि के द्वारा साधारण अवित्तीय विधेयकों के सम्बन्ध में लोकसभा और राज्यसभा को समान शक्ति प्रदान की गयी है, लेकिन मतभेद की स्थिति में लोकसभा की इच्छा ही अन्तिम निर्णय माना जाता है। राज्यसभा विधेयक को मात्र 6 माह रोक सकने के अलावा कुछ नहीं कर सकती है। इस तरह विधायी शक्ति मुख्यतः लोकसभा में निहित है। व्यवहार में अभी तक महत्त्वपूर्ण विधेयक में ही प्रस्तावित किए जा रहे हैं।

2. वित्तीय शक्ति (Financial Powers)- भारतीय संविधान वित्तीय क्षेत्र के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण शक्तियाँ लोकसभा में निहित है। धारा 109 के अनुसार वित्त विधेयक लोकसभा में ही प्रस्तावित किए जा सकते हैं, राज्यसभा में ही नहीं। लोकसभा से पारित होने के बाद वित्त विधेयक राज्यसभा में भेजा जाता है और राज्यसभा के लिए यह आवश्यक है कि उसे वित्त विधेयक की प्राप्ति की तिथि से 14 दिनों के अन्दर लोकसभा को लौटा दे। राज्यसभा विधेयक में संशोधन के लिए सुझाव दे सकती है, लेकिन इन्हें स्वीकार करना या न करना लोकसभा की इच्छा पर करता है। संविधान के अनुसार यदि विधेयक प्राप्त होने के बाद 14 दिनों के अन्दर राज्य सभा सिफारिशों सहित या सिफारिशों के बिना वित्त विधेयक लोकसभा को नहीं लौटाये तो निश्चित तिथि के बाद वह दोनों सदनों से पारित मान लिया जाता है। वार्षिक बजट और अनुदान सम्बन्धी माँग भी लोकसभा के समक्ष ही रखी जाती है और इस प्रकार के समस्त व्यय की स्वीकृति देने का एकाधिकार लोकसभा को ही प्राप्त है।

3. कार्यपालिका पर नियन्त्रण की शक्ति (Power of the control over Executive)__ भारतीय संविधान के अनुसार मन्त्रिमण्डल संसद् (व्यवहारतः लोकसभा) के प्रति उत्तरदायी होता है। मंत्रिमण्डल केवल उसी समय तक अपने पद पर रहता है, जब तक कि उसे लोकसभा का विश्वास प्राप्त हो । संसद् के सदस्य मन्त्रियों से सरकारी नीति के सम्बन्ध में व सरकार के कार्यों के सम्बन्ध में प्रश्न तथा पूरक प्रश्न पूछ सकते हैं तथा उसकी आलोचना कर सकते हैं। संसद सरकारी विधेयक अथवा वजट की स्वीकार करके, मन्त्रियों के वेतन में कटौती का प्रस्ताव स्वीकार करके अथवा किसी सरकारी विधेयक में कोई ऐसा संशोधन करके, जिससे सरकार सहमत न हो, अपना विरोध प्रदर्शित कर सकती है। यह काम रोको प्रस्ताव (Adjournment Motion) पास करके भी सरकारी नीति की गलतियों को प्रकाश में ला सकती है। लोकसभा अविश्वास का प्रस्ताव पास करके कार्यपालिका अर्थात् मन्त्रिपरिषद् को उसके पद से हटा सकती है।कार्यपालिका पर नियन्त्रण की शक्ति के अन्तर्गत ही लोकसभा संघीय लोक सेवा आयोग, भारत के नियन्त्रक और महालेखा परीक्षक, वित्त आयोग, भाषा आयोग व अनुसूचित जाति और जनजाति आयोग आदि की रिपोर्ट पर विचार करती है।

4. संविधान संशोधन-सम्बन्धी शक्ति (Power of amending the Constitution)- संविधान की धारा 368 के अनुसार संविधान में संशोधन कार्य संसद के द्वारा ही किया जा सकता है। संविधान के संशोधन के सम्बन्ध में लोकसभा और राज्य सभा की स्थिति समान है, क्योंकि संविधान संशोधन विधेयक दोनों में से किसी भी सदन में प्रस्तावित किये जा सकते हैं और उन्हें तभी पारित समझा जायेगा, जब कि उन्हें संसद् के दोनों सदन अलग-अलग अपने कुल बहुमत तथा उपस्थित एवं मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पारित कर दें। संविधान के अधिकांश प्रावधानों में अकेली संघीय संसद् के द्वारा ही परिवर्तन किया जा सकता है, केवल कुछ ही प्रावधानों में संशोधन के लिए भारतीय संघ के आधे राज्यों के विधान मण्डलों की स्वीकृति आवश्यक होती है। कोई भी संविधान संशोधन सिर्फ लोकसभा से पारित नहीं किया जा सकता। संविधान का 64वाँ संविधान संशोधन जो क्रमशः पंचायती राज और नगरपालिका विधेयक से सम्बन्धित था, वह लोकसभा से तो पारित हो गया, लेकिन राज्यसभा से नहीं। फलतः वह संविधान संशोधन रद्द हो गया।

5. निर्वाचन मण्डल के रूप में कार्य (Function as an Electoral College ) — लोकसभा निर्वाचन मण्डल के रूप में भी कार्य करती है। लोकसभा के सदस्य राज्य सभा के सदस्यों तथा राज्य विधान सभाओं के सदस्यों के साथ मिलकर राष्ट्रपति को निर्वाचित करते हैं। इसी तरह सिर्फ लोकसभा और राज्यसभा मिलकर उपराष्ट्रपति का भी निर्वाचन करती है। लोकसभा के द्वारा बहुमत दल का नेता निर्वाचित किया जाता है, जो राष्ट्रपति के द्वारा प्रधानमंत्री मनोनीत किए जाते हैं। इसी तरह लोकसभा अपने सदन का अध्यक्ष भी बहुमत से निर्वाचित करती है। यह उसे पदच्युत भी कर सकती है।

6. जनता की शिकायतों का निवारण (Redress of Public Grievances) – लोकसभा के प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा निर्वाचित होकर आते हैं, अतः उनके द्वारा जनता की शिकायतें, जनता के विचार और भावनाएँ सरकार तक पहुँचायी जाती है। लोकसभा के सदस्यगण इस बात की चेष्टा करते है कि सरकार अपनी नीतियों का निर्माण एवं कार्यों का सम्पादन जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए करें।

7. विविध कार्य (Miscellaneous Functions)- लोकसभा कुछ अन्य कार्य भी करती है। यथा—

(i) लोकसभा और राज्यसभा मिलकर राष्ट्रपति पर महाभियोग लगा सकती है

(ii) उपराष्ट्रपति को उसके पद से हटाने के लिए राज्यसभा प्रस्ताव पास कर दे, तो इस प्रस्ताव का लोकसभा द्वारा अनुमोदन आवश्यक होता है।

(iii) लोकसभा और राज्यसभा मिलकर सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के विरुद्ध महाभियोग का प्रस्ताव पास कर सकती है।

(iv) राष्ट्रपति द्वारा संकटकाल की घोषणा को दो महीने के अन्दर संसद् से स्वीकार कराना आवश्यक है अथवा इस प्रकार की घोषणा दो महीने के बाद स्वयं ही समाप्त मान ली जाती है

(v) लोकसभा अपनी संसदीय समितियों के द्वारा अनेक अन्य महत्त्वपूर्ण कार्य करती है।

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि लोकसभा को भारतीय संविधान में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। उसके वाद-विवादों से समस्त देश में जनमत का निर्माण होता रहता है। लोकसभा के सदस्य पाँच वर्ष के बाद जनता के सामने पुनः उपस्थित होते हैं, इसलिए उनका हर एक कार्य राष्ट्रीय हित में होता है। विधि निर्माण के क्षेत्र में लोकसभा की स्थिति सर्वोपरि है। समस्त देश की वित्तीय स्थिति को लोकसभा नियंत्रित करती है कार्यपालिका को विभिन्न तरीकों से नियंत्रित करती है। इसलिए डॉ0 एम पी शर्मा ने ठीक ही कहा है कि-“अगर संसद राज्य का सर्वोच्च अंग है तो लोकसभा संसद का सर्वोच्च अंग है। व्यवहारतः यही संसद् है।”

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