भारतीय राष्ट्रपति के अधिकार अथवा शक्तियां और कार्य का वर्णन कीजिए

भारत का राष्ट्रपति भारतीय संघ का प्रधान तथा अध्यक्ष होता है। संविधान की धारा 53 के अनुसार संघ की समस्त कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होती है। अपनी शक्ति का प्रयोग वह प्रत्यक्ष रूप से या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से करता है। भारतीय संघ में राष्ट्रपति की स्थिति ब्रिटिश सम्राट जैसी है। डॉ0 अम्बेदकर ने संविधान सभा में संविधान का प्रारूप (Draft) प्रस्तुत करते हुए ठीक ही कहा था कि- “भारतीय संविधान में राष्ट्रपति को वही स्थान प्राप्त है, जो स्थान ब्रिटिश संविधान में सम्राट को है। वह राज्य का प्रधान है, कार्यपालिका का नहीं। वह राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है, राष्ट्र पर शासन नहीं करता। वह राष्ट्र का प्रतीक है तथा प्रशासन में उसका स्थान औपचारिक प्रधान जैसा है।”

राष्ट्रपति के अधिकार और कार्य या शक्ति

भारतीय संविधान द्वारा राष्ट्रपति को अनेक अधिकार प्रदान किए गए हैं। कुछ प्रमुख अधिकार और कार्य निम्नलिखित हैं-

1. कार्यपालिका शक्ति (Executive Powers)- भारतीय संविधान की धारा 53 के अनुसार, “संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी।” (Executive powers of the union shall be vested in the President- Art. 53) इसका प्रयोग वह स्वयं या अपने अधीनस्थ अधि कारियों द्वारा करता है। संविधान राष्ट्रपति को उसके कार्यों के सम्पादन में “सहायता तथा परामर्श” (To aid and advice) देने के लिए मंत्रिपरिषद् की व्यवस्था करता है जिसके शीर्ष पर प्रध नमंत्री होता है। राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद् के परामर्श को मानने के लिए बाध्य है। संविधान की धारा 44 में इसका उल्लेख है कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद् के अनुसार कार्य करेगा, लेकिन यह नहीं लिखा है कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद् के परामर्श को मानने के लिए बाध्य होगा। यद्यपि संसदीय परम्परा के अनुसार भारत में राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद् के परामर्श से ही कार्य कर रहा था, फिर भी इस सम्बन्ध में 42वाँ संविधान संशोधन लाकर स्थिति को स्पष्ट कर दिया गया, जिसके अनुसार अब राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद् के परामर्श को मानने के लिए बाध्य होगा। धारा 74 (1) में अब यह स्पष्ट कर दिया गया है कि राष्ट्रपति अपने कार्यों को लागू करने में मंत्रिपरिषद् के परामर्श को मानने के लिए बाध्य है। कार्यपालिका शक्ति के अन्तर्गत निम्नलिखित प्रमुख अधिकार हैं-

(a) नियुक्ति का अधिकार- भारत का राष्ट्रपति जिन संघीय अधिकारियों को नियुक्त करता है, उनमें प्रधानमंत्री मंत्रिपरिषद् के सदस्य, सर्वोच्च तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों, विभिन्न राज्यों के राज्यपालों, संघ के महान्यायवादी (Attorney General), लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष तथा नियंत्रण महालेखा परीक्षक (Comptroller and Auditor General) इत्यादि हैं। इसके अलावा राष्ट्रपति विभिन्न आयोगों जैसे वित्त आयोग, भाषा आयोग, योजना आयोग, निर्वाचन आयोग इत्यादि के अध्यक्ष की भी नियुक्ति करते हैं। लेकिन व्यवहार में सभी तरह की नियुक्ति राष्ट्रपति प्रधानमंत्री के परामर्श से ही करते हैं तथा राष्ट्रपति उसी व्यक्ति को प्रधानमंत्री के रूप में नियुक्त करता है जो लोकसभा में बहुमत दल का नेता हो ।

(b) मंत्रियों के विभागों का वितरण राष्ट्रपति मंत्रियों के बीच विभाग का वितरण करता है। राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के लिए सेवा विधि बनाता है। राष्ट्रपति महालेखा परीक्षक की प्रशासनिक शक्तियों का निर्धारण करता है तथा संघीय लोक सेवा आयोग के लिए सदस्यों की संख्या तय करता है। उच्चतम न्यायालय की कार्यविधि की स्वीकृति भी ही देते हैं।

(c) प्रशासन पर निगरानी रखने का अधिकार- भारतीय संघ का समस्त प्रशासकीय कार्य राष्ट्रपति के नाम से होता है। संसद् द्वारा निर्मित कानूनों का उचित ढंग से पालन किया जा रहा है अथव नहीं, इसके लिए राष्ट्रपति समय-समय पर प्रशासन सम्बन्धी विवरण प्रधानमंत्री से प्राप्त करता है। केन्द्र-शासित क्षेत्रों के प्रशासन के नियंत्रण की जिम्मेदारी भी राष्ट्रपति पर है।

(d) राजनीतिक अधिकार- राष्ट्रपति अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भारत का प्रतिनिधित्व करता है। वह विदेशों में जाने वाले भारतीय राजदूतों को प्रमाण-पत्र देता है तथा विदेशों से आये हुए राजदूतों का प्रमाण-पत्र स्वीकार करता है। विदेशों से संधि या समझौते राष्ट्रपति के नाम से ही होता है, यपि • इनका अनुसमर्थन संसद से होना आवश्यक होता है।

(e) सूचना प्राप्त करने अधिकार- राष्ट्रपति को सूचना प्राप्त करने का अधिकार है। प्रष्ठ गानमंत्री का यह कर्त्तव्य है कि वह राष्ट्रपति को मन्त्रिमण्डल के उन सभी निर्णयों को सूचित करे जिनकी जानकारी राष्ट्रपति रखना चाहते हैं। यदि राष्ट्रपति को यह मालूम हो जाय कि किसी मंत्री द्वारा किया गया निर्णय उचित नहीं है तो वह उस निर्णय को मंत्रिपरिषद् के विचाराधीन रखवा सकते हैं।

(F) राज्य सरकार को निर्देशित करने का अधिकार- राष्ट्रपति को राज्य सरकारों को निर्देशित, नियंत्रित तथा समन्वित करने का अधिकार प्राप्त है। विभिन्न राज्यों के पारस्परिक विवादों के निपटारे के सम्बन्ध में परामर्श देने के लिए राष्ट्रपति अन्तरराज्यिक परिषद् का भी गठन करते हैं।

(g) नियम या विनियम बनाने का अधिकार- राष्ट्रपति को संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठकों से सम्बन्धित नियम बनाने का अधिकार है। वह सर्वोच्च न्यायालय के अधिकारियों और कर्मचारियों के सेवा विषयक नियम भी बना सकता है।.

(h) पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों तथा आदिम जातियों का कल्याण- राष्ट्रपति को यह अधिकार प्राप्त है कि वह अनुसूचित प्रदेशों पर प्रतिवेदन देने वाले आयोग, अनुसूचित जातियों तथा आदिम जातियों के लिए विशेष पदाधिकारी, पिछड़े वर्गों की दशा सुधार सम्बन्धी आयोग इत्यादि की स्थापना कर सम्बद्ध लोगों का कल्याण कर सकता है।

(i) सैनिक अधिकार- भारतीय राष्ट्रपति देश की स्थल, जल तथा नम-सेनाओं का प्रधान सेनापति होता है। राष्ट्रपति ही सेना के तीनों अंगों के प्रधान की नियुक्ति करता है और वे अपने कार्यों के लिए राष्ट्रपति के प्रति उत्तरदायी है। चूँकि राष्ट्रीय सुरक्षा समिति का भी प्रधान होता है, इसलिए इस संस्था के निर्णय के अनुसार, वह युद्ध तथा शांति की घोषणा कर सकता है, यद्यपि इस सन्दर्भ में संसद् की स्वीकृति आवश्यक है

विधायिनी अधिकार (Legislative powers)

2.विधायिनी अधिकार (Legislative powers) – भारतीय राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग होता है। इस नाते उसे अनेक महत्त्वपूर्ण विधायिनी अधिकार प्राप्त हैं। यथा-

(i) राष्ट्रपति संसद् सत्र आहूत करता है, सत्रवसान की घोषणा करता है और लोकसभा को विघटित कर सकता है। प्रत्येक वर्ष संसद् के प्रारम्भिक सत्र में संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में राष्ट्रपति अभिभाषण देता है। इस अभिभाषण में ब्रिटेन के सम्राट की तरह सरकारी नीतियों की चर्चा की जाती है। राष्ट्रपति संसद के दोनों या किसी भी सदन को अपना संदेश भेज सकता है या स्वयं सम्बोधित कर सकता है। मतभेद की स्थिति में वही दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाता है।

(ii) राष्ट्रपति राज्य सभा के 12 ऐसे सदस्यों को मनोनीत करता है जो साहित्य कला, विज्ञान, समाज-सेवा आदि क्षेत्र में प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके हों। वह लोकसभा में भारतीय आंग्ल समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं होने पर इस समुदाय के 2 प्रतिनिधियों को मनोनीत कर सकता है। इसके अतिरिक्त वह भारत के ऐसे क्षेत्रों से भी लोकसभा का सदस्य मनोनीत कर सकता है जहाँ उत्तरदायी शासन व्यवस्था लागू नहीं है।

(iii) संसद् से पारित विधेयक तभी कानून बनते हैं, जब उन पर राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलती। है। राष्ट्रपति साधारण विधेयक पर स्वीकृति नहीं भी दे सकते हैं; क्योंकि उसे निषेधात्मक अधिकार प्राप्त है। किन्तु वही विधेयक यदि दुबारा संसद् से पारित हो जाए तो राष्ट्रपति अपनी स्वीकृति देने के लिए बाध्य है।

(iv) संसद् के विराम काल में राष्ट्रपति को अध्यादेश निकालने का अधिकार है, जिसकी मान्यता संसद् द्वारा निर्मित अधिनियम के समान ही है। लेकिन संसद से इसकी पुष्टि संसद् की अगली बैठक 6 सप्ताह के अन्दर होना जरूरी है अन्यथा अध्यादेश रद्द हो जाएगा। इस अवधि के पूर्व भी राष्ट्रपति द्वारा दूसरी घोषणा से इस तरह के अध्यादेश को समाप्त किया जा सकता है।

(v) राष्ट्रपति को राज्यों के विधानमण्डल के सम्बन्ध में भी कुछ अधिकार प्राप्त हैं। राज्य विधानमण्डल द्वारा पारित ऐसे विधेयकों को जिन्हें राज्यपाल की स्वीकृति के लिए रोक रखे, उन पर राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के बाद ही कानून बनता है।

वित्तीय अधिकार (Financial powers)

3.वित्तीय अधिकार (Financial powers) – वित्तीय क्षेत्र में भी राष्ट्रपति को महत्त्वपूर्ण अधिकार प्राप्त है। वह प्रत्येक वित्तीय वर्ष के प्रारम्भ में संसद के समक्ष देश का वार्षिक बजट प्रस्तुत करवाता है। कोई भी धन विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति से ही लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है। भारत की आकस्मिक निधि पर राष्ट्रपति का ही अधिकार है। वह इस विधि से आकस्मिक व्यय के लिए संसद् को स्वीकृति के पूर्व ही धन दे सकता है। बाद में इसकी पुष्टि संसद से जरुरी है। वह प्रत्येक 5 वर्षों पर देश के आय के स्रोत का सर्वेक्षण करने और केन्द्र-राज्य वित्तीय स्थिति पर सुझाव देने के लिए वित्त आयोग गठित करता है। आयकर से प्राप्त राशि को केन्द्र और राज्यों के बीच बाँटने तथा पटसन निर्यात से प्राप्त धनराशि के बदले बिहार, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल राज्यों की सहायता देने का कार्य भी वही करता है।

न्यायिक अधिकार (Judicial powers)

4. न्यायिक अधिकार (Judicial powers)- राज्याध्यक्ष होने के नाते राष्ट्रपति को न्यायिक अधिकार भी प्राप्त है। वह ऐसे किसी अभियुक्त की सजा कम कर सकता है, माफ कर सकता है, या एक सजा को दूसरी सजा मे बदल सकता है, जिसे असैनिक न्यायालय से दण्ड मिला हो। राष्ट्रपति को क्षमादान का भी अधिकार प्राप्त है, जो उनका एक विशिष्ट अधिकार है।

आपातकालीन शक्तियाँ (Emergency powers)

5. आपातकालीन शक्तियाँ (Emergency powers)- भारतीय संविधान द्वारा राष्ट्रपति को संकटकालीन शक्तियाँ सौंपी गयी हैं। इन संकटकालीन शक्तियों का प्रयोग राष्ट्रपति राष्ट्रीय संकटों का सामना करने के लिए करता है। संविधान में तीन तरह के आपातों का वर्णन है-

(i) युद्ध तथा बाह्य आक्रमण अथवा आंतरिक अशांति (सशस्त्र विद्रोह) से उत्पन्न संकट- (धारा 352)

(ii) राज्यों के सांविधानिक संघ के असफल होने से उत्पन्न संकट- (धारा 356) और

(iii) वित्तीय संकट- ( धारा 360 ) । 

संकटकाल में सभी शक्तियाँ राष्ट्रपति के पास आ जाती है। संकटकालीन अधिकार राष्ट्रपति का सर्वोत्तम अधिकार माना जा सकता है।

विविध (Miscellaneous powers)

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6. विविध (Miscellaneous powers)-राष्ट्रपति को उपर्युक्त शक्तियों एवं अधि कार के अलावा भी कुछ अन्य शक्तियाँ प्राप्त हैं। राष्ट्रपति किसी विधेयक या मामले के सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श ले सकते हैं। राष्ट्रपति को संघीय लोक सेवा आयोग के सदस्यों की संख्या, सेवा नियम एवं अवधि के सम्बन्ध में नियम बनाने की शक्ति है। इसके अलावा उन्हें संघ में हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने तथा अल्पसंख्यकों के साथ विशेष व्यवहार सम्बन्धी शक्तियाँ प्राप्त हैं।

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